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सूनामी - भारतीय महासागर भूकंप

 

भारतीय महासागर में २००४ में आया भूकंप समुद्र की तलहटी में आया भूकंप था, जो ००.५८ यूटीसी (७.५८.५३ स्थानीय समय) २६ दिसम्बर, २००४ को आया था । इस भूकंप से सूनामी की भयंकर लहरें उठी जो कि आधुनिक इतिहास में सबसे अधिक विनाशकारी सिद्ध हुई ।

 

सूनामी, समुद्र में उठने वाली ऐसी भयानक जल की लहरे हैं जो कि जल के नीचे समुद्र की तलहटी में उथल-पुथल से पैदा होती है और बहुत ही तीव्र गति से महासागरों को पार कर दूर तक का सफर करती हैं तथा समुद्री किनारों पर जीवन और संपत्त्िा को भयानक नुकसान पहुंचती है । सूनामी एक जापानी शब्द है, जिसका अर्थ है बंदरगाहों की लहरें, जिन्हें बड़ी ऊंची लहरें कहा जाता है जो कि समुद्र की तलहटी में अचानक होने वाली भूकंपीय हरकत से पैदा होती हैं और समुद्र के पानी को सीधे ऊपर की ओर धकेलते हुए उत्पन्न हुई विराट लहरें महासागर को पार कर दूर तक का सफर तय कर समुद्र के किनारे जमीन को छूती है तो भयंकर तबाही मचाती हैं ।

 

अलॉस्का में १९६४ में ९.२ रिक्टर स्केल पर गुडफ्रायडे के भूकंप के बाद यह ९.० रिक्टर स्केल की गति से आया सबसे बड़ा भूकंप था और इसकी बराबरी १९०० के बाद के चौथे स्थान के सबसे बड़े भूकंपों में हो गई । 

 

सूनामी चेतावनी प्रणाली और तैयारी

 

आधुनिक प्रौद्योगिकी ऐसी घटनाओं की कुछ क्षेत्रों में पूर्व सूचना देने में समर्थ है, जिससे लोगो को ऊंचे स्थानों पर  जाने का मौका मिल जाता है । ऐसी विनाशकारी घटनाओं से बचने का एक ही बढ़िया तरीका है कि ऐसी घटनाओं से बचने के लिए पहले से ही तैयार रहा जाए । हाल ही में सुमात्रा में आए भूकंप और तत्पश्चात सूनामी लहरों के समुद्र तटों और भारतीय महासागर के किनारों पर पहुंचने में तीन घंटों का अंतर था ।

 

भूकंप और उससे उत्पन्न सूनामी

 

भूकंप का केन्द्र सिम्यूल द्वीप के उत्तर और उत्तरी सुमात्रा, इंडोनेशिया के पश्च्िाम तट के भारतीय महासागर में केन्द्रित था और इसने इतिहास में अब तक की सबसे विनाशकारी सूनामी लहरें पैदा की जिससे १,९०,००० से भी अधिक लोगों की मृत्यु हुई । भूकंप के बाद आई सूनामी ३० मीटर (१०० फीट) ऊंची लहरों ने इंडोनेशिया, श्रीलंका, दक्षिण भारत, थाइलैंड तथा अन्य देशों के तटों पर भारी तबाही मचाई । जहाँ तक अफ्रीका के पूर्वी तट का प्रश्न है वहाँ जान-माल का भारी नुकसान हुआ, जो भूकंप केन्द्र से ८००० कि.मी. (५००० मील) दूर दक्षिण अफ्रीका में एलिजाबेथ बंदरगाह पर आई सूनामी लहरों से रिकार्ड मौतें हुईं । लोगों की लाशों के समुद्र में वापस बह जाने के कारण मौतों का सही-सही अनुमान नहीं लगाया जा सका, परन्तु १३ जनवरी, २००५ (घटना के १८ दिन बाद) तक विभिन्न देशों की रिर्पोटों के अनुसार मारे गए लोगों की कुल संख्या १,५९,४८४ (अनुमानत) थी । जिसका विवरण इस प्रकार है :-

 

- इंडोनेशिया   -       ११३,३०६ (३,५९८ लापता)

- श्रीलंका -       २९,८२५  (५,८०६ लापता)

- भारत           -       १०,६७२  (५,७११ लापता - ५,६२५ अंडमान निकोबार द्वीप समूहों पर)

- थाईलैंड   -       ५,३०९   (३,३९६ लापता)

- सोमालिया -       १५०

- म्यांमार -       ५९

- मालद्वीव -       ८२ (२६ लापता)

- मलेशिया   -       ६८ (६ लापता)

- तनजानियाँ      -       १०

- बंगलादेश -      

- केन्या              -       1                                                                                                    

 

हाल ही में  सुनामी लहरों के सागर से उठने का पता लगाने के प्रयास किए गए हैं । चूंकि सुनामी लहरों को तटों तक पहुँने में कुछ घंटों का समय लगा सकता है, अत यदि इनका पता इनके उद्गम स्थल के निकट ही लगा लिया जाए तो इस समय का उपयोग, लोगों को इसकी चेतावनी देने के लिए किया जा सकता है ।  

 

भारत में सुनामी से निपटने की तैयारी का पता इसी तथ्य से लगाया जा सकता है, कि इस संबंध में कोई पॉलिसी गाइडलाइन्स नहीं बनाई गई है । भारतीय परिदृश्य से मात्र चेतावनी प्रणाली का विकास कर लेना इसका कोई समाधान नहीं है, बल्कि हमें एक व्यापक जागरूकता अभियान भी शुरू करना होगा ।

 

भारतीय परिदृश्य

 

अण्डमान - निकोबार द्वीप-समूहों, पूर्वी तट के  व्यापक भागों तथा भारतीय भूमि के पश्च्िामी तटों के कुछ भागों पर सुनामी की वजह से व्यापक तबाही हुई है । यद्यपि भारतीय तटों पर सुनामी लहरों का प्रभाव नियमित रूप से देखने को नहीं मिलता है, तथापि अनेक देश सदियों से निरन्तर सुनामी का प्रभाव झेलते रहे हैं ।

 

०२ अप्रैल, १७६२ को भारतीय तटों पर सुनामी लहरों का पहला आक्रमण हुआ था । बंगाल की खाड़ी में बंगलादेश-म्यांमार सीमा पर भूकंप की वजह से सुनामी लहरे उठीं । हुगली, कलकता में २ मीटर तक जल-स्तर ऊपर उठ गया और ढाका में सैंकडों बोट इसकी चपेट में आ गई तथा अनेक लोग डूब गए । ३१ दिसम्बर, १८८१ को कार निकोबार क्षेत्र में ७.९ परिमाण के भूकंप की वजह से ०.८.मीटर उँची सुनामी लहरें पैदा हुई, जिन्हें बंगाल की खाड़ी के आस-पास रिकार्ड किया गया । १८८३ में क्रकाटोऑ वोल्कैनो के फटने से उठी सुनामी लहरों को भारतीय तटों पर भी महसूस किया गया था । बीसवीं शताब्दी में भी भारतीय तटों पर दो भयंकर सुनामी आक्रमण हुए हैं । २६ जून, १९४१ में अण्डमान द्वीपसमूहों पर ८.१ परिमाण के भूकंप की वजह से एक मीटर उँची सुनामी लहरें पैदा हुई थी । इससे पोर्टब्लेयर में सैलूलर जेल भी क्षतिग्रस्त हो गई थी और भूकंप के झटकों को मद्रास तथा कोलम्बों में भी महसूस किया गया था । इतना ही नहीं कुछ द्वीपों की भूमि भी लगभग ६० सें.मी. तक डूब गई थी । २८ नवम्बर, १९४५ को पाकिस्तान के मकरन तट पर ८.० परिमाण का एक  भूकंप आया था, जिसकी वजह से सुनामी लहरें पैदा हुई । मकरन बन्दरगाहों पर १२ मीटर की उँची लहरों के कारण व्यापक क्षति हुई । कच्छ के तटों पर पहुँची सुनामी लहरों की उँचाई ११ मीटर और मुम्बई में लगभग २ मीटर थी तथा सुनामी की वजह से मुम्बई में १५ लोगों की मौत हो गई । लगभग ४००० लोग भूकंप तथा सुनामी के कारण मर गए । एक समान सुनामी चेतावनी प्रणाली के विकास के अलावा, आज की माँग लोगों को सुनामी के विनाश को समझने के लिए प्रशिक्षित करने तथा इसके विनाशकारी प्रभावों को न्यूनतम करने के तरीके ढूंढने की है ।

 

·       हडको ने सीपीडब्ल्यूडी तथा एनबीसीसी की टीमों के साथ-प्रारंभिक क्षति का जायजा लेने के लिए तमिलनाडु तथा पॉण्डिचेरी का दौरा किया और स्थानीय अधिकारियों के साथ बैठकें भी की ।

 

·       हडको ने प्रस्तुतिकरण और स्थानीय बैठकों के लिए अण्डमान निकोबार द्वीप-समूह का दौरा करने वाले राष्ट्रीय दल के साथ भी भाग लिया ।

 

·       हडको ने माननीय गृह-मंत्री, माननीय कृषि मंत्री, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, शहरी रोजगार और गरीबी उपशमन मंत्रालय तथा शहरी विकास मंत्रालय के साथ हुई राष्ट्र-स्तरीय बैठकों में भी भाग लिया ।

 

·       शहरी विकास मंत्रालय ने अण्डमान-निकोबार द्वीप-समूह तथा पाण्डिचेरी के लिए सीपीडब्ल्यूडी तथा एनबीसीसी को कार्यकर्ता एजेन्सियों के रूप में प्रस्तावित किया था । हडको को स्थायी पुनर्बसाव के लिए डिजाइन एवं आयोजना सहायता देने के लिए कहा गया है ।

 

 

 

 

 

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